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उम्‍मीदों पर खरी नहीं उतरी सनी देओल और साक्षी तंवर की फिल्म मोहल्‍ला अस्‍सी


मोहल्ला अस्सी सही मायनों में एक उत्तेजक और चुनौतीपूर्ण फिल्म होनी चाहिए थी, जिसमें पांडेय जी यानि सनी देओल को पिछड़े जमाने से निकल कर आज में ढलना है।

एक संस्कृत टीचर की नौकरी में पांडेयजी की छोटी सी तनख्वाह है और वो ऐसे किरदारों से घिरे हुए हैं जो गाली गलौच के साथ बातचीत करते हैं। उनकी पत्नी के किरदार में साक्षी तंवर अपनी छाप छोड़ती है जो हमेशा चिढ़ी हुई रहती है और हमेशा ही गाली दे कर बात करती है। उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जगहों में गाली देना आम बात है और इसे खबर भाषा नहीं माना जाता, क्योंकि उनके लिए ये आम बोलचाल की भाषा है।

यहां एक टूरिस्ट गाइड के किरदार में रवि किशन भी हैं जो अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से विदेशी महिलाओं को असली काशी की सैर कराने के नाम पर घाट के पास गंदे से घरों में ले कर जाता है। इससे मिलने वाला किराया इस परिवार के लिए थोड़ी आमदनी का काम करता है बावजूद इसके कि इनके लिए ये इनका धर्म भ्रष्ट करने के समान है।

मुंबई. काशीनाथ सिंह, काशी उर्फ बनारस उर्फ वाराणसी को हिन्दुओं के तीर्थ स्थल के तौर पर दिखाते हैं, साथ ही एक ऐसी जगह के तौर पर भी जो सवालों और उससे मिलने वाली शिक्षा को बढ़ावा देती है। आखिरकार जब तक मन में सवाल नहीं होंगे, तो आप कैसे कुछ सीख सकते हैं?

इसी नॉवेल पर आधारित चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म मोहल्ला अस्सी सही मायनों में एक उत्तेजक और चुनौतीपूर्ण फिल्म होनी चाहिए थी, जिसमें पांडेय जी यानि सनी देओल को पिछड़े जमाने से निकल कर आज में ढलना है।




एक संस्कृत टीचर की नौकरी में पांडेयजी की छोटी सी तनख्वाह है और वो ऐसे किरदारों से घिरे हुए हैं जो गाली गलौच के साथ बातचीत करते हैं। उनकी पत्नी के किरदार में साक्षी तंवर अपनी छाप छोड़ती है जो हमेशा चिढ़ी हुई रहती है और हमेशा ही गाली दे कर बात करती है। उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जगहों में गाली देना आम बात है और इसे खबर भाषा नहीं माना जाता, क्योंकि उनके लिए ये आम बोलचाल की भाषा है।

यहां एक टूरिस्ट गाइड के किरदार में रवि किशन भी हैं जो अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से विदेशी महिलाओं को असली काशी की सैर कराने के नाम पर घाट के पास गंदे से घरों में ले कर जाता है। इससे मिलने वाला किराया इस परिवार के लिए थोड़ी आमदनी का काम करता है बावजूद इसके कि इनके लिए ये इनका धर्म भ्रष्ट करने के समान है।

यहीं कुछ आम लोग भी हैं जो पप्पू की दुकान पर पाये जाते हैं, एक छोटी सी चाय की दुकान जहां हर तरह के लोग आते हैं। भगवा कपड़े पहने मुकेश तिवारी जिनका नारा है, ‘मंदिर वहीं बनायेंगे’, टोपी पहने मुसलमान जिसका बुरा वक्त चल रहा है, हमेशा गुस्से में नाक चढ़ाया हुआ आदमी जो इस बात से दुखी है कि कैसे ‘लेफ्ट पार्टीज’ अब खत्‍महो चुकी हैं और कुछ समझदार लोग जो ज्ञान की बात करते हुए कहते हैं, ‘काशी में तो युगों से हर हर महादेव बोल जाता था, ये जय श्री राम कहां से आया?’

ऐसी बातों का इतना खुल कर फिल्म में बोलना अच्छा लगता है और वो भी बनारस में। भगवान शिव का रूप धारण किये एक किरदार जिसका चेहरा नीले रंग से पेंट किया है और गले में प्लास्टिक का सांप बांधे हुए है, कहता है, “मैंने तो इंसान बनाया, हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई तुम लोगों ने।” इस तरह के डायलॉग 60 और 70 के दशक की मसाला फिल्मों में अच्छे लगते थे, जिसे हम हिंदुत्व का उदाहरण देने वाला एक और छोटा मोटा डायलॉग समझ कर भूल जाते।


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